महिला आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश, क्या-क्या होंगे बदलाव? जानें हर सवाल का जवाब
कितनी बदल जाएगी राजनीति?
Women’s Reservation Bill: देश में लंबे समय से महिला आरक्षण का मुद्दा चर्चा में बना हुआ है. इस बिल के जरिए सरकार की कोशिश है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाया जाए. अब तक संसद और विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधियों की संख्या बहुत कम है. ऐसे में महिला आरक्षण बिल आता है तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ जाएगी.
महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 3 बिल आज संसद में पेश किए गए हैं. सरकार की तरफ से लाए जा रहे इस बिल में लोकसभा सांसदों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव शामिल है. इस समय सदन में सदस्यों की संख्या 543 है. सीटों की गिनती को करने के लिए परिसीमन भी किया जाएगा.
पहले भी आ चुका है महिला आरक्षण बिल
ऐसा पहली बार नहीं है जब संसद में महिला आरक्षण बिल लाया गया है. इससे पहले भी साल 1996 में आरक्षण बिल पेश किया गया था. उस समय इसे 81वां संविधान संशोधन कहा गया था. उस समय भी इस बिल में लोकसभा और राज्य सभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव था. हालांकि उस समय यह बिल लोकसभा में तो पास हो गया था. लेकिन इसे कभी पारित नहीं कराया जा सका.
सरकार ने संसद में पेश किए ये तीन विधेयक
सरकार की तरफ से तीन विधेयक पेश किए हैं. ये 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर आधारित हैं.
- केंद्र शासित प्रदेश क़ानून (संशोधन) विधेयक 2026
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026
- परिसीमन विधेयक 2026 (डीलिमिटेशन बिल 2026)
केंद्र की मोदी सरकार की तरफ से साल 2023 में महिला आरक्षण कानून लाया गया था. इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से संसद में पेश किया गया था. पहले यह लोकसभा में और बाद में राज्यसभा में यह पारित हुआ. इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन गया है.
अब सरकार इस कानून में लगभग 30 महीनों के बाद बदलाव करने जा रही है. यही वजह है कि संसद का 3 दिनों का सत्र बुलाया गया है. इसमें लोकसभा में करीब 18 घंटे और राज्यसभा में 10 घंटे चर्चा की जाएगी.
विधेयक में बदलाव के पीछे की क्या है वजह?
सरकार अपने ही लाए कानून में 30 महीनों के बाद बदलाव करने जा रही है. साल 2023 में जब यह कानून लाया गया था तो उसमें तय था कि साल 2027 की जनगणना पूरी होने के बाद परिसीमन किया जाएगा. इसके बाद ही यह लागू किया जाएगा. अगर ऐसा होता तो महिला संरक्षण अधिनियम लागू होना साल 2034 के लोकसभा चुनाव तक टल सकता था. सरकार इस कानून को साल 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले लागू कराना चाहती है.
नए विधेयक के आने के बाद होने वाले बदलाव
- देश की संसद में फिलहाल लोकसभा में 78 महिला सांसद (कुल सीटों का 14%) और राज्यसभा में 42 महिला सांसद (कुल सीटों का 18%) है. यह काफी कम है. नए विधेयक के बाद लोकसभा में 850 सीटें हो जाएंगी. इसके बाद संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ जाएगी.
2. महिलाओं के लिए यह आरक्षण 15 साल तक लागू रहेगा. यानी 2029, 2034 और 2039 के लोकसभा चुनावों में यह आरक्षण लागू रहेगा. अगर जरूरत पड़ी तो इस आरक्षण को आगे भी बढ़ाया जा सकता है. नए कानून के मुताबिक लगभग हर चुनाव में आरक्षित सीटें बदलती रहेंगी. ताकि हर सीट पर महिलाओं को प्रतिनिधित्व करने का मौका मिले.
3. महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन आयोग के गठन के लिए भी बिल पेश किया गया है. देश में अभी जो लोकसभा सीटों की संख्या है वह साल 1971 की जनगणना के आधार पर है. जबकि नए सिरे से परिसीमन कराने पर संविधान ने रोक लगा रखी है. अब सरकार इस विधेयक के जरिए पहले रोक को हटाएगी. इसके बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा. जो देश की विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या तय करेगी.
नए और पुराने विधेयक में क्या है अंतर
सरकार ने तय किया है कि अब परिसीमन साल 2011 की जनगणना के आधार पर ही कराया जाएगा. ऐसा करने से यह कानून साल 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू हो जाएगा. मतलब अगले चुनाव में ही संसद के साथ-साथ विधानसभाओं में सीटें बढ़ सकती हैं.
नए बिल और पुराने बिल में सबसे बड़ा अंतर लागू करने की प्रक्रिया में है. नया आने वाला बिल तुरंत लागू नहीं होगा. इसके पहले जनगणना और परिसीमन कराया जाएगा. इसमें देश की लोकसभा सीटें और विधानसभा सीटें तय की जाएगी. इन दोनों प्रक्रियाओं के बाद ही आरक्षण लागू होगा.
देश में 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ-साथ ओडिशा, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी लागू होगा. नए बिल के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा. आरक्षण की अवधि 15 साल तय की गई है. जरूरत पड़ने पर इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है.
विपक्ष ने की तीनों विधयकों की आलोचना
संसद में तीनों विधयकों के पेश होने से पहले ही तमाम विपक्षी दलों की बैठक आयोजित की गई थी. इस दौरान विपक्षी नेताओं ने इन तीनों विधेयकों की आलोचना की है.
विपक्षी दलों ने इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों से कुछ दिन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश बताया और उसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया है. विपक्षी नेताओं की तरफ से इस विधेयक को लाने से पहले सर्वदलीय बैठक की मांग की गई थी. हालांकि ऐसा नहीं हो सका है.
कई विपक्षी नेताओं ने चिंता जाहिर की है कि सीटों के पुनर्निर्धारण का जो आधार है वो गलत है. ऐसा होने से दक्षिणी राज्यों के लोकसभा में प्रतिनिधित्व को कम हो सकता है.
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