‘महिला को अधिकार, गर्भ रखना है या नहीं…’, दंपती के बीच चल रहे विवाद पर MP हाई कोर्ट का फैसला, कहा- पति की मंजूरी जरूरी नहीं

MP News: इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति दे दी है.
Indore Bench of High Court (File Photo)

हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ(File Photo)

MP News: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए 13 सप्ताह की गर्भवती विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति दे दी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में तय समयसीमा के भीतर गर्भावस्था होने पर महिला स्वयं तय करेगी कि उसे गर्भ जारी रखना है या नहीं. इसके लिए पति की सहमति अनिवार्य नहीं है. यह आदेश 29 जून 2026 को पारित किया गया.

दंपती का विवाद पहुंचा हाई कोर्ट

मामला इंदौर संभाग के एक दंपती से जुड़ा है, जिनकी शादी करीब दो साल पहले हुई थी. समय के साथ दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया और महिला पति से अलग रहने लगी. इसी दौरान वह 13 सप्ताह की गर्भवती थी. महिला ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में बच्चे को जन्म देना उसके और बच्चे, दोनों के भविष्य के लिए उचित नहीं होगा.

मानसिक तनाव का दिया हवाला

महिला ने अपने अधिवक्ता जीपी सिंह के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की. उसने बताया कि पति से वैवाहिक संबंध समाप्त करने का निर्णय लिया जा चुका था, लेकिन बाद में पति अपने रुख से पीछे हट गया.

ऐसे में गर्भावस्था जारी रखना उसके लिए मानसिक तनाव, भावनात्मक पीड़ा और असुरक्षा का कारण बन गया है. सुनवाई के दौरान पति को नोटिस भेजा गया, लेकिन वह कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ. वहीं राज्य सरकार ने भी याचिका का विरोध नहीं किया.

अनुच्छेद-21 का किया उल्लेख

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर’ का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत महिला को अपने शरीर और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का मौलिक अधिकार प्राप्त है. अदालत ने कहा कि अवांछित गर्भावस्था का सबसे अधिक असर महिला पर पड़ता है, इसलिए अंतिम निर्णय उसी का होगा.

MTP एक्ट के तहत दी अनुमति

कोर्ट ने माना कि महिला की गर्भावस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (MTP) एक्ट, 1971 की निर्धारित सीमा के भीतर है. इसलिए अधिकृत चिकित्सक कानून के अनुसार गर्भसमापन कर सकते हैं. अदालत ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.

महिला की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान से संरक्षित हैं. साथ ही डॉक्टरों को निर्देश दिए गए कि गर्भपात की प्रक्रिया सभी कानूनी और चिकित्सकीय दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए पूरी संवेदनशीलता के साथ की जाए.

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