नए Bharat ABIS सिस्टम से खत्म होगी डुप्लीकेट आधार का झंझट, जानें कैसे करता है काम

Bharat ABIS: ABIS का मतलब है ऑटोमेटेड बायोमेट्रिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम. यह मल्टी-मोडल प्लेटफॉर्म है. इसमें फिंगरप्रिंट, आंख की पुतली और चेहरे को मिलाकर 13.5 KB का एक टेंपलेट बनाया जाता है. इस टेंपलेट को पुराने रिकॉर्ड से मिलाकर चेक किया जाता है कि व्यक्ति का आधार पहले से मौजूद तो नहीं है.
Aadhaar Card

आधार कार्ड

Bharat ABIS: आधार भारत में पहचान का सबसे बड़ा जरिया है. लेकिन 1.5 अरब लोगों का डेटा संभालने में कई बार गड़बड़ी हो जाती है. कई बार एक ही व्यक्ति के दो धार बन जाते हैं. 2022 में सरकार ने बताया था कि 6 लाख डुप्लीकेट आधार रद्द किए गए हैं. इस समस्या को खत्म करने के लिए UIDAI ने नया ओपन सोर्स सिस्टम Bharat ABIS तैयार किया है.

क्या है Bharat ABIS तकनीक

ABIS का मतलब है ऑटोमेटेड बायोमेट्रिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम. यह मल्टी-मोडल प्लेटफॉर्म है. इसमें फिंगरप्रिंट, आंख की पुतली और चेहरे को मिलाकर 13.5 KB का एक टेंपलेट बनाया जाता है. इस टेंपलेट को पुराने रिकॉर्ड से मिलाकर चेक किया जाता है कि व्यक्ति का आधार पहले से मौजूद तो नहीं है. इसमें स्मार्ट सिस्टम भी है जो लोड को कई सर्वर पर बांट देता है.

किसने बनाया है सिस्टम?

इस नए सिस्टम को UIDAI के 6 रिसर्चर्स की टीम ने मिलकर तैयार किया है. इस टीम में ट्रिपल आईटी हैदराबाद के एक रिसर्चर भी शामिल हैं. इसके अलावा अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के मशहूर बायोमेट्रिक्स एक्सपर्ट प्रफेसर अनिल जैन भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं. इस सिस्टम को पहले 1 लाख से 2 लाख डी-आइडेंटिफाइड डेटासेट पर ट्रेन किया गया है. ट्रेनिंग के बाद इसे 22 करोड़ आधार रिकॉर्ड्स की बड़ी गैलरी पर परखा गया है, ताकि इसकी सटीकता को अच्छे से जांचा जा सके.

कितना तेज है सिस्टम

रिपोर्ट्स के अनुसार 2 करोड़ रिकॉर्ड्स पर हुई टेस्टिंग में Bharat ABIS बेहद सटीक और तेज साबित हुआ है. इसकी टेस्टिंग के दौरान सही आईडको गलती से डुप्लीकेट बताने की दर सिर्फ 0.1 प्रतिशत रही. वहीं असली डुप्लीकेट को पहचानने में चूक जाने की दर सिर्फ 0.05 प्रतिशत रही.

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आम लोगों को क्या फायदा होगा

इसका सबसे ज्यादा फायदा बुजुर्गों और मजदूरों को मिलेगा. उनके फिंगरप्रिंट घिस जाते हैं जिससे राशन और पेंशन में परेशानी आती है. यह सिस्टम घिसे हुए निशानों को भी पहचान लेगा. साथ ही दुनिया के 160 छोटे देश जो महंगा सिस्टम नहीं खरीद सकते, वे इस मुफ्त तकनीक का इस्तेमाल कर सकेंगे.

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