बस्तर के जंगलों में ‘टाइगर कॉलिंग’: लाल आतंक के गढ़ में अब बाघों की सुरक्षा का चक्रव्यूह… मैदान में उतरेगी स्पेशल फोर्स
प्रतीकात्मक तस्वीर
जगदलपुर. कभी जिन घने जंगलों में सुरक्षा बलों की गश्त सिर्फ नक्सल विरोधी अभियानों तक सीमित हुआ करती थी, अब वहां देश के सबसे बड़े शिकारी यानी ‘बाघ‘ की सुरक्षा के लिए बकायदा रणनीति तैयार हो रही है. बस्तर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब मैदानी अमले को ट्रेंड करने के लिए संभाग स्तरीय ‘टाइगर प्रोटेक्शन वर्कशॉप’ का शंखनाद हुआ है. (Bastar Tiger Protection Special Force)
वन मंत्री केदार कश्यप के विशेष मार्गदर्शन में वन विद्यालय जगदलपुर में चल रहा यह दो दिवसीय आयोजन सिर्फ एक रूटीन ट्रेनिंग नहीं, बल्कि बस्तर के जंगलों में टाइगर कॉरिडोर को पुख्ता करने का एक मास्टरप्लान है.

‘गोलियों की गूंज’ से ‘Pugmark की ट्रैकिंग’ तक का सफर
बस्तर के जंगलों में पिछले कुछ सालों में बाघों की मूवमेंट और उनकी वापसी के संकेत मिले हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या मैदानी स्तर का अमला (फॉरस्ट गार्ड और रेंकर्स) इन मेहमानों की सुरक्षा और मॉनिटरिंग के लिए तैयार है?
इसी चुनौती को भांपते हुए इस कार्यशाला में सिर्फ कागजी ज्ञान नहीं, बल्कि ग्राउंड-जीरो वॉरफेयर की तर्ज पर ‘वाइल्डलाइफ इंटेलिजेंस’ और ट्रैकिंग सिखाई जा रही है. (Bastar Tiger Protection Special Force)
ट्रेनिंग की खास बातें
वर्कशॉप में कर्मचारियों को सिर्फ पगमार्क देखना ही नहीं, बल्कि एक ‘शिकारी’ की नजर से यह पहचानना सिखाया जा रहा है कि पगमार्क नर बाघ का है या मादा का, और उसकी उम्र क्या है. अक्सर मैदानी अमला पगमार्क में धोखा खा जाता है. इसे दूर करने के लिए लेपर्ड और टाइगर के ‘फिल्ड साइन्स’ और स्क्रैच मार्क्स में बारीक अंतर की क्लास ली गई. आधुनिक कैमरा ट्रैप तकनीक के साथ-साथ जंगलों में मजबूत मुखबिर तंत्र (Informant Network) तैयार करने पर जोर दिया गया है, ताकि वन्यजीव तस्करों और शिकारियों पर नकेल कसी जा सके.
पहले दिन क्लासरूम में थ्योरी और परीक्षा के बाद, अब दूसरे दिन (3 अक्टूबर) पूरा अमला सीधे बस्तर के जंगलों में उतरकर लाइव ट्रैकिंग और प्रैक्टिकल एक्सरसाइज करेगा.
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