मोदी सरकार में विवादों में रहा शिक्षा मंत्रालय? विरोध प्रदर्शन, पेपर लीक के बाद इस्तीफे तक की नौबत
Education Minister: देश की राजधानी दिल्ली में 36 दिनों से चल रहा प्रदर्शन 25 जुलाई को समाप्त हो गया. इस प्रदर्शन को खत्म कराने के लिए सरकार को अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराना पड़ा. उन्होंने इस्तीफा दे दिया और प्रदर्शन समाप्त हो गया. नरेंद्र मोदी सरकार में ऐसा पहली बार नहीं है जब शिक्षा मंत्रालय को लेकर इस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा हो. शुरुआत से ही इस विभाग में विवादों का लंबा नाता रहा है.
पिछले एक दशक से अधिक समय में इस मंत्रालय की जिम्मेदारी कई नेताओं ने संभाली है. हर मंत्री ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए, लेकिन लगभग हर कार्यकाल किसी न किसी बड़े विवाद, छात्र आंदोलन या परीक्षा प्रणाली से जुड़े सवालों के कारण सुर्खियों में भी रहा है.
हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं और परीक्षा प्रबंधन को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर शिक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर बहस तेज कर दी है. ऐसे में जानते हैं एनडीए सरकार के शिक्षा मंत्रियों का कार्यकाल और उनका विवाद क्या रहा है.
स्मृति ईरानी के पहले फैसले से बढ़ गया था विवाद
साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद स्मृति ईरानी को 26 मई 2014 से 5 जुलाई 2016 तक शिक्षा मंत्री रहीं हैं. पद संभालने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के चार साल के ग्रेजुएशन (FYUP)को खत्म करने का फैसला लिया था. विरोध के बाद सरकार ने इसे सुधारात्मक कदम बताया, जबकि इस फैसले पर शिक्षकों और छात्रों के बीच भी व्यापक बहस हुई.
उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर विचार-विमर्श शुरू हुआ और उच्च शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग के लिए नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) की शुरुआत की गई.
हालांकि उनका कार्यकाल कई बड़े विवादों से घिरा रहा है. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का मामला राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बना. इसके बाद जेएनयू में देशद्रोह मामले और छात्र आंदोलन ने भी सरकार को विपक्ष के निशाने पर ला दिया. संसद से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक इन मुद्दों पर तीखी बहस हुई. जुलाई 2016 में उनका मंत्रालय बदल दिया गया.
प्रदर्शनों में बीता प्रकाश जावड़ेकर का कार्यकाल
स्मृति ईरानी के बाद प्रकाश जावड़ेकर ने मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, उनके कार्यकाल में भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) को अधिक स्वायत्तता देने के उद्देश्य से IIM Act लागू किया गया. नई शिक्षा नीति पर भी काम आगे बढ़ा.
हालांकि इस दौरान विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति, आरक्षण व्यवस्था, संस्थानों की स्वायत्तता और छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शन जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे. कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक फैसलों को लेकर भी विवाद सामने आए.
रमेश पोखरियाल के सामने कोरोना बना चुनौती
साल 2019 में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली थी. उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 मानी जाती है, जिसने स्कूल और उच्च शिक्षा में व्यापक बदलावों का रोडमैप पेश किया.
लेकिन इसी दौरान कोरोना महामारी ने पूरी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर दिया. स्कूल और कॉलेज लंबे समय तक बंद रहे. ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल असमानता और परीक्षाओं के आयोजन को लेकर लगातार सवाल उठे. JEE और NEET जैसी परीक्षाओं को महामारी के बीच कराने के फैसले का कई छात्र संगठनों ने विरोध किया. बाद में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने पद छोड़ दिया.
कैसा रहा धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल
जुलाई 2021 में धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाली. उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति को लागू करने की दिशा में कई पहल की गईं. पीएम-श्री स्कूल योजना, भारतीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा और कौशल आधारित शिक्षा जैसे विषयों पर सरकार ने विशेष जोर दिया.
हालांकि इसी दौरान राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के कामकाज को लेकर कई विवाद सामने आए. प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक की घटनाओं और परीक्षा प्रबंधन को लेकर विपक्ष तथा छात्र संगठनों ने लगातार सवाल उठाए. खास तौर पर मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए. कई राज्यों में जांच एजेंसियों ने पेपर लीक से जुड़े मामलों में कार्रवाई भी की. परीक्षा प्रणाली में सुधार और जवाबदेही की मांग लगातार उठती रही.
हाल के महीनों में प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन, परीक्षा केंद्रों की व्यवस्था, डिजिटल निगरानी, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कार्यप्रणाली को लेकर बहस फिर तेज हुई है. नीट पेपर लीक के बाद आलम यह रहा कि उन्हें विरोध प्रदर्शनों की वजह से शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा. कुल मिलाकर कहा जाए तो पिछले 12 सालों से ही शिक्षा विभाग चुनौती, विरोध और कई अन्य चुनौतियों का सामना करता आ रहा है. इसके बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ है.
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