Indore: इंदौर में ₹35 करोड़ की ई-बसें धूल फांक रहीं, लापरवाही की भेंट चढ़ा ग्रीन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट

Indore: इंदौर में ग्रीन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट तहत करोड़ों रुपये की लागत से जो वातानुकूलित बसें खरीदी गई थी उनमे से 15 बसे सिस्टम की लापरवाही से वर्कशॉप में धूल खा रही हैं.
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वर्कशॉप में खड़ी ई-बसें

Indore: इंदौर शहर को प्रदूषण मुक्त बनाने और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से खरीदी गई करोड़ों रुपये की इलेक्ट्रिक बसें आज वर्कशॉप में बेकार पड़ी हैं. वर्ष 2018 में केंद्र सरकार की फेम इंडिया योजना के तहत इंदौर को 40 वातानुकूलित इलेक्ट्रिक सिटी बसें मिली थीं. इनमें से करीब 15 बसें अब संचालन से बाहर हैं और उनकी अनुमानित कीमत 30 से 35 करोड़ रुपये बताई जा रही है.

राजीव गांधी चौराहा स्थित AICTSL की वर्कशॉप में खड़ी इन बसों की हालत चिंताजनक है. जिन बसों का उद्देश्य प्रतिदिन हजारों यात्रियों को प्रदूषण-मुक्त यात्रा उपलब्ध कराना था, वे अब फ्लेक्स, होर्डिंग और अन्य कबाड़ रखने की जगह बन गई हैं. बसों के भीतर सीटों से लेकर गैलरी तक सामान भरा हुआ है और कई बसों के दरवाजे तक ठीक से बंद नहीं हो पा रहे हैं.

बसों के स्पेयर पार्ट्स और बैटरियां उपलब्ध नहीं

बताया जा रहा है कि बसों के स्पेयर पार्ट्स और बैटरियां समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण कई वाहन लंबे समय से वर्कशॉप में खड़े हैं. बैटरी खराब होने के बाद उनका समय पर प्रतिस्थापन नहीं किया गया, जिससे करोड़ों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति उपयोग से बाहर हो गई. नियमित रखरखाव और मरम्मत के अभाव में इन बसों की स्थिति लगातार खराब होती चली गई.

मानकों के अनुसार प्रदर्शन

AICTSL के अनुसार, ये बसें जिस कंपनी से खरीदी गई थीं, वह उसका पहला इलेक्ट्रिक बस मॉडल था. संचालन के दौरान तकनीकी समस्याएं सामने आईं और बसें तय मानकों के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर सकीं. इस कारण कंपनी पर पेनल्टी भी लगाई गई. अधिकारियों का कहना है कि स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बनी रही, जिससे बसों का संचालन प्रभावित हुआ.

करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई थीं बसें

यह मामला केवल खराब हो चुकी बसों का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रभावी उपयोग, रखरखाव व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है. करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई इन बसों का समय रहते रखरखाव किया जाता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाते, तो इन्हें दोबारा सड़कों पर उतारा जा सकता था. अब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे.

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