Damoh: एक शहर दो तस्वीरें! कांवड़ यात्रा में आस्था का सैलाब! दूसरी ओर अर्थी लेकर उफनती नदी पार करते लोग
Damoh: एक शहर दो तस्वीरें, एक तरफ कांवड़ यात्रा, दूसरी ओर अर्थी लेकर उफनती नदी पार करते लोग
Damoh News: मध्य प्रदेश के दमोह से सामने आईं ये दो तस्वीरें एक ही इलाके की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाती हैं. एक तस्वीर में सैकड़ों लोगों का आस्था से भरा काफिला नजर आ रहा है, हाथों में भगवा ध्वज हैं और कांवड़ यात्रा का उत्साह दिखाई दे रहा है.
वहीं दूसरी तस्वीर में विकास के दावों पर सवाल खड़े करती तस्वीर है. जहां ग्रामीणों को नदी के तेज बहाव पानी में उतरकर अपने मृत परिजन को अंतिम विदाई देने के लिए मुक्तिधाम तक पहुंचना पड़ा. एक तरफ आस्था के लिए रास्ता तय कर रहा जनसैलाब, तो दूसरी तरफ अंतिम संस्कार के लिए रास्ते की तलाश करते ग्रामीण है.
तस्वीरें खुद पूछ रही हैं सवाल?
पहली तस्वीर में सड़क पर श्रद्धालुओं का बड़ा काफिला दिखाई दे रहा है. भगवा झंडों के साथ लोग धार्मिक यात्रा में शामिल हैं. चेहरों पर उत्साह की एक अलग ही मुस्कान के साथ कंधों पर कांवड़ है.
लेकिन दूसरी तस्वीर का मंजर बिल्कुल अलग है. यहां ग्रामीण नदी के तेज बहाव के साथ उसे पार कर रहे हैं, ताकि समय पर शव का अंतिम संस्कार किया जा सके. बारिश के कारण नदी का जलस्तर बढ़ा लेकिन ग्रामीणों के पैर तनक भी नहीं डगमगाए. यही नदी उनके लिए रोजमर्रा की जिंदगी और अंतिम संस्कार के बीच सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है.
एक तरफ यात्रा… दूसरी तरफ मजबूरी….
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस इलाके में धार्मिक यात्राओं के लिए बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर निकलते हैं, उसी इलाके में किसी ग्रामीण की मौत होने पर उसके परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए नदी पार करने की मजबूरी क्यों है? यह तस्वीर किसी राजनीतिक बयान से ज्यादा ताकतवर है क्योंकि एक तस्वीर में आस्था के लिए आगे बढ़ते कदम हैं. दूसरी तस्वीर में अपनों को अंतिम विदाई देने के लिए जान जोखिम में डालते कदम नजर आते हैं.
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ग्रामीणों का संघर्ष तीन साल से जारी
ग्रामीणों के मुताबिक सिंग्रामपुर के टगरा मोहल्ले में नदी पर पुल या पुलिया निर्माण की मांग करीब तीन साल से उठाई जा रही है. दावा है कि आरईएस विभाग द्वारा मौके का निरीक्षण करने के बाद करीब 40 लाख रुपये की लागत से पुल निर्माण की फाइल भी तैयार की गई थी. तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ अर्पित वर्मा ने इसकी मंजूरी दी थी लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी पुल धरातल पर नहीं उतर सका. नतीजा यह है कि बारिश के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ते ही ग्रामीणों की मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है.
मुक्तिधाम पहुंचने में संघर्ष
किसी परिवार में मौत होना अपने आप में सबसे बड़ा दुख होता है लेकिन टगरा मोहल्ले के ग्रामीणों के लिए कई बार इसके बाद एक और परीक्षा शुरू हो जाती है. मृतक की अर्थी को कंधा देने के बाद उसे मुक्तिधाम तक पहुंचने के लिए नदी का रास्ता तय करना पड़ता है. तेज बहाव होने पर घंटों पानी कम होने का इंतजार करना पड़ता है और जब हालात कुछ सामान्य होते हैं. तब ग्रामीण जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हैं.
सोचिए, जिस व्यक्ति को कंधे पर उठाकर अंतिम विदाई दी जानी है. उसी अर्थी को लेकर ग्रामीणों को कमर तक पानी में उतरना पड़े तो यह सिर्फ मजबूरी नहीं, व्यवस्था पर बड़ा सवाल है.
तस्वीरें बयां करती कहानियां
एक तस्वीर कहती है कि आस्था के लिए रास्ते मौजूद हैं. दूसरी तस्वीर पूछती है, क्या अंतिम विदाई के लिए भी एक सुरक्षित रास्ता नहीं हो सकता है? ग्रामीण हल्ले भाई ने बताया कि उन्हें किसी बड़े विकास प्रोजेक्ट की नहीं, सिर्फ एक ऐसे पुल की जरूरत है, जिससे बारिश के दिनों में भी वे सुरक्षित तरीके से नदी पार कर सकें. सिंग्रामपुर के टगरा मोहल्ले की ये दोनों तस्वीरें अब सिस्टम के सामने खड़ी हैं.
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ग्रामीणों को उम्मीद जल्द बनेगा पुल
एक तरफ आस्था का बड़ा काफिला है, तो दूसरी तरफ वही ग्रामीण हैं, जो अपने मृत परिजन को अंतिम विदाई देने के लिए नदी के पानी में उतरने को मजबूर हैं. जब करीब तीन साल पहले 40 लाख रुपये के पुल की फाइल तैयार हो चुकी थी, तो सवाल यही है, आखिर वह फाइल अब तक जमीन पर क्यों नहीं उतर सकी? ग्रामीणों को उम्मीद है कि इन तस्वीरों के सामने आने के बाद जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजों पर कार्रवाई नहीं करेंगे, बल्कि नदी पर पुल भी नजर आएगा.