MP News: बड़वानी में मछुआरों ने किया नर्मदा बचाओ आंदोलन, नाव रैली निकालकार सरकार के सामने रखी 10 मांगे
नर्मदा बचाओ आंदोलन
MP News: बड़वानी जिले में नर्मदा बचाओ आंदोलन के तहत सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित विस्थापित मछुआरों ने सोमवार को अपने अधिकारों की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया. इस आंदोलन का नेतृत्व वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने किया. मछुआरों ने कसरावद से राजघाट तक नर्मदा नदी में विशाल नाव रैली निकाली, जिसमें 30 से अधिक नावों पर सवार सैकड़ों लोग शामिल हुए. रैली के माध्यम से उन्होंने सरकार का ध्यान अपनी वर्षों से लंबित मांगों की ओर आकृष्ट करने का प्रयास किया.
मछुआरा संगठन ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन
नाव रैली के समापन के बाद मछुआरा संगठनों की ओर से कलेक्टर बड़वानी को 10 सूत्रीय मांगों का विस्तृत ज्ञापन सौंपे जाने की तैयारी की गई. ज्ञापन में सरदार सरोवर परियोजना से प्रभावित मछुआरों को नर्मदा ट्रिब्यूनल के निर्णय के अनुरूप अधिकार दिए जाने, प्रस्तावित नर्मदा माता मत्स्य सहकारी उत्पादन एवं विपणन संघ के पंजीकरण, पुनर्वास से जुड़े लाभ, आवास और आजीविका की व्यवस्था करने, मत्स्य व्यवसाय को सहकारी समितियों को सौंपने तथा ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने जैसी प्रमुख मांगें शामिल हैं.
आंदोलन में मछुआरों ने पानी के दुष्प्रभावों पर जताई चिंता
आंदोलन के दौरान मछुआरों ने जलाशय में बढ़ते प्रदूषण, अवैध रेत खनन, क्रूज संचालन और जलस्तर में गिरावट से मत्स्याखेट पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई. इसके साथ ही मछुआरों को किसान का दर्जा देने, केसीसी कार्ड उपलब्ध कराने, मत्स्याखेट की बंद अवधि में आर्थिक सहायता बढ़ाने और पुलिस-प्रशासन द्वारा उत्पीड़न के मामलों में त्वरित कार्रवाई की मांग भी उठाई गई.
मांगों पर विचार नहीं किया तो तेज हाेगा आंदोलन
मेधा पाटकर ने कहा कि नर्मदा घाटी के मछुआरे विस्थापन के सबसे बड़े शिकार हैं, लेकिन लंबे समय बीत जाने के बाद भी उन्हें उनके कानूनी अधिकार नहीं मिल पाए हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा. इस जल भरो आंदोलन और नाव रैली में बड़वानी, धार, खरगोन और अलीराजपुर जिलों के बड़ी संख्या में मछुआरा परिवारों ने भाग लिया.
आंदोलनकारियों ने दिया नर्मदा ट्रिब्यूनल का हवाला
आंदोलनकारियों ने नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले का हवाला देते हुए बताया कि यह निर्णय सरदार सरोवर अंतरराज्यीय परियोजना से जुड़े लाभ, हानि और पुनर्वास के मुद्दों पर लंबी प्रक्रिया के बाद पारित हुआ था. 18 अक्टूबर 2000 को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार यह फैसला कानून का रूप रखता है और इसके पालन की जिम्मेदारी शासन की है.
ट्रिब्यूनल की धारा XI की उपधारा V(8) के तहत सरदार सरोवर जलाशय में मत्स्य पालन का अधिकार राज्य शासन के अधीन बताया गया है. इस संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्रालय के मत्स्य विभाग के एक अधिकारी द्वारा कुछ वर्ष पहले महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात के मुख्य सचिवों को पत्र भी भेजा जा चुका है.
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