क्या आप जानते हैं बुंदेलखंड के ‘दशरथ मांझी’ की कहानी? पत्नी का अपमान होने पर खोद दिया था 50 फीट का कुआं

बुंदेलखंड हमेशा से वीरता और आत्मसम्मान की कहानियों के लिए जाना जाता है. ये कहानी भी आत्मसम्मान से जुड़ी हुई है. ये कहानी है बुंदेलखंड के 'दशरथ मांझी' की. आइए जानते हैं.
ajab singh adivasi

अजब सिंह आदिवासी

आप ‘माउंटेन मेन दशरथ मांझी’ के बारे में तो जानते ही होंगे, जिन्होंने अपनी पत्नी के लिए विशालकाय पहाड़ को अपने हाथो से बीच से काटकर रास्ता बना दिया था. ऐसी ही एक कहानी बुंदेलखंड में छुपी हुई है. बुंदेलखंड हमेशा से वीरता और आत्मसम्मान की कहानियों के लिए जाना जाता है. ये कहानी भी आत्मसम्मान से जुड़ी हुई है. एमपी के सागर जिले में 71 वर्षीय आदिवासी बुजुर्ग अजब सिंह ने प्रशासनिक बेरुखी व अपनी पत्नी के अपमान का बदला सिस्टम से लड़ने के बजाय जमीन का सीना चीरकर करकर इतिहास रच दिया.

अभी आपको कहानी समझ में नहीं आ रही होगी लेकिन जैसे ही आगे बढ़ेंगे आप भावुक हो उठेंगे और इस आदिवासी के प्रेम और अत्मसम्मान की भावना के आगे नतमस्तक हो जाएंगे. यह पूरी दास्तान है सागर जिले के नरयावली विधानसभा के अंतर्गत आने वाले इमलिया गांव की. सरकार और सिस्टम को इस गांव की याद कभी नहीं आई. मानों जैसे सरकारी दफ्तरों में लगे हुए नक्शों में ये गांव हो ही न.

बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते हैं लोग

इस गांव में आज भी करीब 300 लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते हैं. आज से 45 वर्ष पहले अजब सिंह नाम के आदिवासी ने सिस्टम से अपने गांव में एक कुआँ खुदवाने की मांग की. लेकिन उस समय उनके पास 5 हजार रुपये नहीं थे. बुजुर्ग ने गांव में कुआं खुदवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, लेकिन तब उनसे पांच हजार रुपये की रिश्वत मांगी गई. अब एक मजदूर के पास इनते पैसे कहां से आएंगे. अंत में हुआ भी वहीं प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए.

नाली का पानी पीकर सोना पड़ता था

धीरे-धीरे समय बीता और गांव में पानी की समस्या और बढ़ती गई. कभी-कभी तो अजब सिंह आदीवासी के पूरे परिवार को नाली का पानी पीकर सोना पड़ता था और कभी बच्चे और परिवार प्यासे भी सो जाता था. एक दिन पानी की किल्लत से परेशान होकर अजब सिंह की पत्नी सदा रानी पास के गांव में अपने जेठ के घर पानी भरने गईं. लेकिन वहां सदा रानी को बेइज्जत कर भगा दिया. जब इस बात का पता अजब सिंह को चला तो उनके आत्म सम्मान को बहुत ठेस पहुंची और उन्होंने ठान लिया कि अब किसी के भी सामने हाथ नहीं फैसलाएंगे.

अजब सिंह ने कुदाल-फावड़ा उठाया

फिर क्या अजब सिंह ने कुदाल-फावड़ा उठाया और अपने घर के पास ही जमीन खोदनी शुरू कर दी. वह दिनभर मजदूरी करते ताकि बच्चों का पेट भर सके व सुबह-शाम का बचा हुआ सारा वक्त कुआं खोदने में लगा देते. करीब दो साल की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद अजब सिंह ने अकेले ही 50 फीट गहरा कुआं खोदकर पानी निकाल दिया.

आज स्थिति यह है कि गांव का सरकारी कुआं गर्मियों में सूख जाता है और सरकार की ‘नल-जल योजना’ की टंकी सफेद हाथी बनकर खड़ी है. ऐसे में पूरा गांव आज भी अजब सिंह के इसी कुएं के भरोसे है. हालांकि, अब इसका पानी मटमैला हो चुका है, जिससे बच्चियों को स्कूल छोड़ पानी ढोना पड़ रहा है, लेकिन ग्रामीणों के पास कोई और विकल्प नहीं है.

एक बार फिर सिस्टम की दहलीज पर खड़े अजब सिंह

आपको ये जानकार हैरानी की जिस आदमी ने पूरे गांव की पानी की किल्लत खत्म की आज भी वह दाने-दाने कि लिए मोहताज है. उसकी झोपड़ी गिरने के कगार पर है. अजब सिंह पिछले तीन सालों से प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ पाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं. लेकिन फिर सिस्टम के सामने घुटने टेकने की बजाय वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर खुद ही ईटों और मिट्टी का एक कमरा बनाने में जुट गए है.

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