बिहार में कब होगा EBC का इंतजार खत्म? 36% आबादी के बाद भी नहीं बन सका सीएम
बिहार की राजनीति में आज भी ईबीसी को इंतजार...
BIhar Politics: बिहार में नई सरकार का गठन हो गया है. इस बार भी बिहार की कमान OBC वर्ग से ताल्लुक रखने वाले सम्राट चौधरी को मिली है. नीतीश कुमार भी ओबीसी वर्ग से ही आते थे. सम्राट को सीएम बनाए जाने के बाद एक बार फिर EBC वर्ग चर्चा में आ गया है. सवाल उठ रहे हैं कि राज्य में सबसे ज्यादा जनसंख्या होने के बाद भी इस वर्ग से सीएम नहीं बनाया गया है.
बिहार में साल 1990 के बाद से ही ओबीसी वर्ग के नेता ही मुख्यमंत्री बनते आ रहे हैं. चाहे लालू प्रसाद यादव हों या फिर नीतीश कुमार सब नेता ओबीसी वर्ग से ही आते हैं. बिहार के नए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कोइरी समाज से आते हैं. इसके पहले नीतीश कुमार सीएम थे, वो कुर्म समाज से आते हैं. दोनों को ही प्रदेश में लव और कुश कहा जाता है.
कोइरी बिहार में यादव के मुकाबले एक मजबूत पिछड़ी जाति मानी जाती है. यही वजह है कि वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने सम्राट चौधरी को सीएम बनाया है. हालांकि इस फैसले के बाद एक बार फिर ईबीसी वर्ग के हाथ कुछ भी नहीं आया है. प्रदेश में सबसे ज्यादा संख्या होने के बाद भी विधानसभा में महज 10 प्रतिशत सदस्य ही ईबीसी से आते हैं.
EBC के पास ज्यादा समय तक नहीं रह पाई
बिहार की सत्ता 35 सालों से ओबीसी और ईबीसी के पास है. लेकिन इन 35 सालों में ज्यादातर सत्ता ओबीसी वर्ग के पास ही रही है. ईबीसी के नाम पर केवल कर्पूरी ठाकुर ही दो बार सीएम चुने गए हैं. हालांकि उनके दोनों ही कार्यकाल बहुत छोटे-छोटे ही रहे हैं. दलितों (SC) समाज से इस दौरान तीन CM बनाए गए. लेकिन कोई भी एक साल भी नहीं टिका था. जब-जब सत्ता ओबीसी के हाथ में आई उनके पास ज्यादा समय तक कार्यकाल रहा जबकि ईबीसी वर्ग के पास कुछ ही समय तक बागडोर रही.
बिहार में साल 1990 से 2026 तक OBC का बोलबाला रहा है, आज भी ईबीसी वर्ग इंतजार कर रहा है. हले अपर कास्ट, फिर यादव, फिर कुर्मी और अब कुर्मी का भाई कुशवाहा. मतलब ईबीसी वर्ग को इंतजार है कि उनका भी समय आएगा.
कब तक रह सकती है ईबीसी की लड़ाई जारी?
बिहार की कुल आबादी का EBC 36% हैं, यानी प्रदेश की सरकार पलटने और बनाए रखने का दम इस तपके के पास है. लेकिन 112 जातियों में बंटे होने से कोई एक चेहरा नहीं उभर सका है. मतलब यह वर्ग इस समय केवल वोट बैंक बनकर रह गया है. एक कोई नेता न होने के कारण ना तो यह अपनी भूमिका विधानसभा में ठीक से दिखा पाए हैं और ना ही प्रदेश के बड़े पदों पर उनको मौका मिला है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब प्रदेश में ईबीसी वर्ग का कोई नेता उभरकर सामने नहीं आता है. तब तक ऐसा संभव नहीं है. जैसे कर्पूरी ठाकुर ने पूरे समाज को एक किया था. उसके अनुरूप उन्हें बिहार की कमान भी मिली थी. मतलब साफ है कि बिहार में फिलहाल ईबीसी के पास इंतजार करने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है.
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