पांढुर्णा का फेमस गोटमार! झंडे पर कब्जे के लिए बरसते हैं पत्थर, 300 साल से भी ज्यादा पुराना है इतिहास

Pandhurna Gotmar Fair: महाराष्ट्र के बॉर्डर पर स्थित पांढुर्णा जिला अपने एक खास त्योहार के लिए जाना जाता है, जिसे गोटमार मेला कहा जाता है. लोगों का मानना है कि इस परंपरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी, यानी गोटमार को 300 साल से भी ज्यादा हो चुके हैं.
Pandhurna Gotmar Fair Villagers from two villages hurl stones each other over flag

पांढुर्णा का फेमस गोटमार मेला

Pandhurna Gotmar Fair: मध्य प्रदेश के पांढुर्ना में हर साल पोला त्योहार के दूसरे गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है. इस बार ये 11 सितंबर को मनाया जाएगा. झंडे पर कब्जे के लिए अलग-अलग गांव के लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं. जिसे झंडा मिल जाता है, वो विजेता माना जाता है.

क्या है गोटमार?

महाराष्ट्र के बॉर्डर पर स्थित पांढुर्णा जिला अपने एक खास त्योहार के लिए जाना जाता है, जिसे गोटमार मेला कहा जाता है. ‘गोटमार’ मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ पत्थर मारना होता है. हर साल पोला के दूसरे दिन सावरगांव और पांढुर्णा के लोग जाम नदी के किनारे इकट्ठा होते हैं. नदी के बीचों-बीच पेड़ का तना स्थापित किया जाता है. जिसके ऊपर झंडा लगाया जाता है. सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक लोग एक-दूसरे पर पथराव करते हैं, जो गांव झंडे तक पहुंच पाता है. वह जीत जाता है.

300 साल से पुरानी परंपरा

लोगों का मानना है कि इस परंपरा की शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी, यानी गोटमार को 300 साल से भी ज्यादा हो चुके हैं. दरअसल, पोला त्योहार के दिन बैलों को सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. इसी दिन साबरगांव के लोग पलाश वृक्ष को काटकर जाम नदी के बीच गाड़ते हैं. इस पर लाल कपड़ा, तोरण, नारियल, फूल-माला चढ़ाकर पूजन किया जाता है.

इसके बाद दूसरे दिन सुबह होते ही लोग उस वृक्ष की एवं झंडे की पूजा करते है. सुबह 8 बजे से शुरु हो जाता है एक दूसरे को पत्थर मारने का खेल. ढ़ोल ढमाकों के बीच एक-दूसरे को पीछे धकेलने का खेल शुरू होता है. यह क्रम लगातार चलता रहता है.

इस बारे में क्या कहानी है?

इस मेले के आयोजन के संबंध में कई प्रकार की किवंदतियां हैं. इन किवंदतियों में सबसे प्रचलित और आम किवंदती ये है कि सावरगांव की एक कन्या का पांढुर्णा के किसी लड़के से प्रेम हो गया था. दोनों ने चोरी छिपे प्रेम विवाह कर लिया था. पांढुर्णा का लड़का साथियों के साथ सावरगांव जाकर लड़की को भगाकर अपने साथ ले जा रहा था. उस समय जाम नदी पर पुल नहीं था.

नदी में गर्दन भर पानी रहता था, जिसे तैरकर या किसी की पीठ पर बैठकर पार किया जा सकता था और जब लड़का, लड़की को लेकर नदी से जा रहा था. तब सावरगांव के लोगों को पता चला और उन्होंने लड़के व उसके साथियों पर पत्थरों से हमला शुरू किया. जानकारी मिलने पर पहुंचे पांढुर्णा पक्ष के लोगों ने भी जवाब में पथराव शुरू कर दी. पांढुर्णा पक्ष एवं सावरगांव पक्ष के बीच इस पत्थरों की बौछारों से इन दोनों प्रेमियों की मृत्यु जाम नदी के बीच ही हो गई. इसके बाद से ये परंपरा जारी है.

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आस्था और परंपरा के नाम पर लोग एक-दूसरे को लोग लहुलुहान कर देते हैं. इसे देखते हुए प्रशासन दोनों जगहों के लोगों को रबर की गेंद उपलब्ध कराई थी. इसके बावजूद भी लोग पत्थरों का इस्तेमाल करते हैं.

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