MP High Court: साइबर फ्रॉड मामलों पर एमपी हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पूरे खाते को फ्रीज नहीं कर सकते बैंक
इंदौर हाई कोर्ट
Indore News: साइबर फ्रॉड या संदिग्ध लेन-देन के नाम पर पूरे बैंक खाते फ्रीज करने की प्रथा पर इंदौर हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल किसी शिकायत या जांच एजेंसी के कहने मात्र से बैंक पूरे खाते को फ्रीज नहीं कर सकते. ऐसा करना खाताधारक के मौलिक और वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा.
कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा?
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यदि किसी खाते में साइबर फ्रॉड या संदिग्ध ट्रांजैक्शन की आशंका है, तो केवल उसी विवादित या संदिग्ध राशि को ही रोका जा सकता है. पूरी रकम या खाते की अन्य वैध राशि को फ्रीज करना उचित नहीं है. न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि संदिग्ध राशि को अधिकतम तीन माह के लिए एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट) के रूप में रखा जा सकता है, ताकि जांच पूरी होने तक राशि सुरक्षित रहे.
खाताधारक कब अपनी रकम निकाल सकते हैं?
यदि तीन महीने की अवधि में जांच एजेंसी यह साबित नहीं कर पाती कि संबंधित राशि वास्तव में फ्रॉड से जुड़ी है, तो खाताधारक को वह रकम निकालने का पूरा अधिकार होगा. कोर्ट ने कहा कि जांच लंबित होने के नाम पर किसी व्यक्ति के पूरे वित्तीय लेन-देन को बाधित करना न्यायसंगत नहीं है.
क्या खाताधारकों के लिए यह नियम फायदेमंद है?
यह फैसला उन हजारों खाताधारकों के लिए राहत भरा माना जा रहा है, जिनके खाते मामूली शिकायत या संदिग्ध ट्रांजैक्शन के आधार पर पूरी तरह सीज कर दिए जाते थे. खाते फ्रीज होने से लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें, व्यापारिक गतिविधियां और आर्थिक जिम्मेदारियां प्रभावित होती थीं.
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इंदौर हाई कोर्ट का क्या मकसद है?
न्यायालय ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि एक ओर जहां साइबर अपराध पर सख्ती जरूरी है, वहीं निर्दोष खाताधारकों के अधिकारों की भी रक्षा की जानी चाहिए. यह आदेश भविष्य में बैंकों और जांच एजेंसियों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश के रूप में काम करेगा. इंदौर हाई कोर्ट का यह फैसला साइबर फ्रॉड मामलों में पारदर्शिता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.