आबकारी टेंडर प्रक्रिया में शामिल नहीं होगी सोम डिस्टलरी, लाइसेंस निरस्त, विभाग की कार्यप्रणाली पर हाई कोर्ट ने उठाए सवाल
सोम डिस्टलरीज प्राइवेट लिमिटेड
MP News: सोम डिस्टलरी के अवैध शराब से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रख लिया है. इसी वजह से 24 मार्च को आबकारी टेंडर प्रक्रिया में सोम ग्रुप शामिल नहीं हो पाएगा क्योंकि लाइसेंस पहले ही निरस्त किया जा चुका है. इसके साथ ही न्यायालय ने आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 23 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ के समक्ष हुई. सुनवाई में सोम डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में कंपनी को बड़ा झटका लगता दिख रहा है. कंपनी ने लाइसेंस को रद्द करने को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि प्रथम दृष्टया आबकारी विभाग की कार्रवाई कानून के अनुरूप है.
“फर्जी परमिट, कोई सफाई नहीं”
अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि 1200 पेटी विदेशी शराब का परिवहन फर्जी ट्रांजिट परमिट के आधार पर किया गया. याचिकाकर्ता कंपनी अपने जवाब में इस गंभीर आरोप का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी. कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की चुप्पी अप्रत्यक्ष रूप से अपराध स्वीकार करने जैसी स्थिति पैदा करती है।
कर्मचारियों को सजा, कंपनी भी जिम्मेदार
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि कंपनी के कर्मचारियों और संबंधित व्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420, 467, 468, 471 और 120-B सहित,तथा मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 की धारा 34(2) के तहत दोषी ठहराया जा चुका है.
याचिकाकर्ता की दलील कमजोर
अदालत ने “अल्टर ईगो” सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनी अपने अधिकारियों/एजेंट्स के कार्यों से अलग नहीं हो सकती है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की दलीलें कमजोर पड़ीं. कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागराथ ने तर्क दिया कि कारण बताओ नोटिस पुराने लाइसेंस अवधि (2023-24) से जुड़ा था. नए लाइसेंस (2024-25, 2025-26) पर इसका असर नहीं होना चाहिए.
लेकिन कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 31 के तहत कार्रवाई का आधार अपराध है, न कि सिर्फ लाइसेंस की अवधि. प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का दावा भी खारिज किया. कोर्ट ने पाया कि कारण बताओ नोटिस में आरोप स्पष्ट थे. सुनवाई का
“शराब व्यापार मौलिक अधिकार नहीं”
अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि शराब का व्यापार कोई मौलिक अधिकार नहीं है. राज्य को इस क्षेत्र में सख्त नियंत्रण का अधिकार है. खासकर जब मामला राजस्व नुकसान और धोखाधड़ी से जुड़ा हो. कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रुख साफ किया. फ्रॉड सभी कार्रवाइयों को शून्य कर देता है. आनुपातिकता के सिद्धांत के तहत भी निलंबन उचित सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले इस मामले में लागू नहीं होंगे.
व्यावसायिक नुकसान झेलना पड़ेगा
कोर्ट ने यह भी माना कि आबकारी आयुक्त द्वारा की गई कार्रवाई कानून के तहत और उचित प्रक्रिया के अनुसार की गई थी. परमिट में गड़बड़ियों को गंभीर मानते हुए विभाग ने जो कदम उठाया, वह न्यायसंगत है. इस फैसले के बाद सोम डिस्टिलरीज़ को बड़ा आर्थिक और व्यावसायिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. लाइसेंस रद्द होने से कंपनी के संचालन और सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ेगा.
क्या है पूरा मामला ?
- साल 2011 में फर्जी परमिट के जरिए शराब परिवहन का मामला सामने आया.
- ट्रायल कोर्ट से कई आरोपियों की दोषसिद्धि हुई.
- उसी आधार पर 2024 में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया.
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इस सुनवाई से साफ संकेत मिल रहे हैं कि सोम डिस्टलरी के लिए कानूनी लड़ाई मुश्किल होती जा रही है. अगर अंतिम आदेश भी इसी दिशा में आता है, तो यह मामला मध्य प्रदेश में शराब कारोबार और आबकारी नियंत्रण के लिए एक बड़ा नजीर बन सकता है.