‘अनुकंपा नियुक्ति पैतृक संपत्ति नहीं’, बेटे और बेटी दोनों के नौकरी पर दावा करने पर HC की टिप्पणी, युवक को दी प्राथमिकता
सांकेतिक तस्वीर.
MP News: ‘अनुकंपा नियुक्ति कोई पैतृक संपत्ति नहीं है. ना ही उत्तराधिकार से मिलने वाला अधिकार है. इसलिए इसके लिए उत्तराधिकार सर्टिफिकेट मांगना मनमाना है.’
ये आदेश मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर बेटे और बेटी के दावों पर किया है. हाई कोर्ट ने नौकरी के लिए बेटे को प्राथमिकता देते हुए बेटी की याचिका खारिज कर दी.
‘बेटे को शादीशुदा बेटी पर प्राथमिकता है’
हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 2014 की नीति का जिक्र किया. कोर्ट ने कहा कि 2014 नीति के मुताबिक अनुकंपा नियुक्ति में क्रमानुसार पति, पत्नी, पुत्र फिर पुत्री प्राथमिकता दी जाती है. इसके बाद विधवा या तलाकशुदा पुत्री का नंबर आता है. इस आधार पर कोर्ट ने बेटे को अनुकंपा नियुक्ति पर प्राथमिकता दी है.
विभाग ने मांगा था उत्तराधिकार सर्टिफिकेट
दरअसल पूरा मामला रतलाम जिला अस्पताल से जुड़ा है. यहां ड्राइवर के पद पर काम करन वाले रमेशवान गोस्वामी की 22 जून 2020 को मौत हो गई थी. जिसके बाद रमेशवान के बेटे रितेश वान और बेटी अनीता वान दोनों ने ही अनुकंपा नियुक्ति के तहत नौकरी के लिए दावा किया था. वहीं विभाग की तरफ से दोनों से उत्तराधिकारी सर्टिफिकेट की मांग की गई. इसके बाद दोनों ही कोर्ट चले गए. जिसके बाद कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के लिए उत्तराधिकार सर्टिफिकेट मांगना मनमाना है और कानून के तहत नहीं आता है.
सरकार को पुनर्विचार करने का निर्देश दिया
दरअसल कोर्ट में दोनों ही पक्षों(रितेश और अनीता) की तरफ से दलील पेश की गई थी. रितेश ने कहा था कि घर की देखभाल करने वाला कोई नहीं है और बहन की शादी हो गई है. ऐसे में मां और परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए नौकरी की जरूरत है. पिता ने नॉमिनी में भी नाम दिया था. वहीं अनीता ने बताया कि उसका सेवा लाभ में उसका भी अधिकार है. अनीता ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का जिक्र भी किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नॉमिनी संरक्षक होता है मालिक नहीं.
हाालांकि हाई कोर्ट ने अनीता की याचिका खारिज करने के साथ ही रितेश को प्राथमकिता देते हुए राज्य सरकार को मामले में पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है.