जामिया में कैसे बहाल हुआ छात्र संघ चुनाव? जानें किन छात्राओं ने भूख हड़ताल कर दिलाई जीत
जामिया मिल्लिया इस्लामिया
Jamia Millia Islamia: जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव बहाल कराने की मांग को लेकर 18 दिनों तक आंदोलन चला. कई छात्राओं ने चुनाव बहाल कराने भूख हड़ताल तक की. यही वजह है कि प्रशासन को उनकी मांगें माननी पड़ी हैं. प्रदर्शन के दौरान नौशीन फारूक और हनीना बिंत उमर ने छात्रों को एकजुट करने और आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली.
वहीं, रिदा नौशाद खान सात छात्रों के साथ भूख हड़ताल पर बैठीं और लगातार आठ दिनों तक अनशन किया. लंबे विरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जुलाई 2027 तक छात्रसंघ चुनाव कराने की समयसीमा तय की है.
20 सालों से नहीं हुए थे चुनाव
दरअसल, जामिया में करीब दो दशक से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं. इसी को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था. 18 दिनों तक चले प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय में बंद जैसे हालात रहे. पुलिस की तैनाती और प्रतिबंधों के बीच छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध जारी रखा.
नौशीन फारूक की भूमिका रही खास
इस आंदोलन में पोर्ट ब्लेयर की रहने वाली नौशीन फारूक ने अहम जिम्मेदारी निभाई. वह डिजास्टर मैनेजमेंट में एमए की सेकंड ईयर की स्टूडेंट हैं. नौशीन के मुताबिक, जामिया में दाखिला लेने के बाद उन्हें पता चला कि यहां छात्रसंघ नहीं है. इसके बाद उन्होंने छात्रों की समस्याओं को करीब से समझा.
उनका कहना है कि छात्राओं को रात 10 बजे तक हॉस्टल लौटने की पाबंदी, साफ-सफाई की कमी, खराब कमरों और वॉशरूम जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. छात्रसंघ होने से इन मुद्दों को उठाने के लिए एक मजबूत मंच मिलेगा.
केरल के त्रिशूर की रहने वाली हनीना बिंत उमर भी आंदोलन में एक्टिव रहीं. लॉ की थर्ड ईयर की स्टूडेंट हनीना ने कहा कि गलत होता देखकर चुप नहीं रहना चाहिए. उन्होंने छात्र आंदोलन के पीछे दाखिले में कथित गड़बड़ियों और दूसरे मुद्दों को भी वजह बताया है.
रिदा नौशाद ने भूख हड़ताल से प्रशासन को झुकाया
लखनऊ की रिदा नौशाद खान ने भूख हड़ताल के जरिए आंदोलन को मजबूती दी. वह पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए की लास्ट ईयर की स्टूडेंट हैं. रिदा ने आठ दिन तक अनशन किया. लेकिन, मां की तबीयत खराब होने के कारण उन्हें इसे खत्म करना पड़ा
रिदा का कहना है कि छात्रसंघ केवल चुनाव कराने का माध्यम नहीं, बल्कि महिलाओं, अल्पसंख्यकों और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को अपनी बात रखने का अधिकार देता है. उन्होंने साफ किया कि उनका किसी राजनीतिक संगठन से संबंध नहीं है. उनके मुताबिक, विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी और कैंटीन बंद होने और छात्राओं की सुविधाओं पर पाबंदियों के बावजूद आंदोलन जारी रहा.
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