Historic Defeat of the Left in Keralam: ढह गया वाम का ‘आखिरी किला’, केरलम से लेफ्ट का सफाया! बंगाल में भी हाशिए पर
पिनाराई विजयन(File Photo)
Left Parties Losing Stronghold in India: विधानसभा चुनावों के रुझानों के बाद संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) प्रचंड बहुमत से केरलम में सरकार बनाता दिख रहा है. पिछली बार केरलम में विजयन पिनाराई के नेतृत्व में एलडीएफ ने सरकार बनाई थी. लेकिन इस बार सत्तारूढ़ एलडीएफ काफी पीछ रह गई है. माना जा रहा है कि इसी के साथ ही देश में लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया है.
बंगाल में रिकॉर्ड 34 सालों तक किया शासन
पश्चिम बंगाल में वाम दलों ने 34 सालों तक शासन किया है, जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है. लेकिन आज की देश में वामदल अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं. केरलम को लेफ्ट के अंतिम किले के रूप में देखा जाता था. लेकिन इस विधानसभा चुनाव में वह किला भी ढह गया. विजयन पिनाराई एक मात्र मुख्यमंत्री थे, जो वामदलों का नेतृत्व कर रहे थे. लेकिन केरलम में हार के साथ ही वाम दल हाशिए पर आ गया है.
वामदल कभी केंद्र में निभाते थे किंग मेकर की भूमिका
देश में जो वाम दल की हालत है, उनके लिए वापसी कर पाना बेहद कठिन है. मौजूदा समय में बात करें तो देश में केरलम, बंगाल और त्रिपुरा तीन राज्यों में वाम विचारधारा को मानने वाले सबसे ज्यादा लोग हैं. लेकिन इन राज्यों में अब तक केरलम में ही लेफ्ट की सरकार थी, जो कि इस विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद अब नहीं रहेगी. बंगाल में भी पिछले चुनावों से लेफ्ट पार्टियों की स्थिति बेहद खराब है. जबकि त्रिपुरा में भी वामदल सत्ता से दूर हैं, और वापसी बेहद मुश्किल नजर आती है. शायद देश में एक पीढ़ी वामदलों को सही से पहचानती भी नहीं होगी. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमशा से ही वामदलों का हाल ऐसा था. एक वक्त था राज्यों में ही नहीं केंद्र सरकार में वामदलों का प्रभाव और दखल होता था.
बीजेपी की अटल सरकार जाने के बाद 2004 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई थी. तब वामदल किंग मेकर की भूमिका में थे. लेकिन आज संसद में भी वामदलों के सांसदों की संख्या बेहद सीमित हो गई है, जिसमें आगे चलकर सुधार की संभावना कम नजर आती है.
छात्र यूनियन भी हुई कमजोर
राज्यों के विधानसभा या फिर केंद्र के चुनावों में ही नहीं, बल्कि छात्र यूनियन से लेकर ट्रेड यूनियन तक सभी जगह वामदलों की उपस्थिति कमजोर हो गई है. केरलम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और जेएनयू को छोड़ दें तो शायद ही देश की कोई बड़ी यूनिवर्सिटी होगी, जिसमें वामपंथी विचारधारा के आधार पर कोई छात्रदल राजनीति करता हो. हालांकि केरल में अभी भी वाम छात्र यूनियन सक्रिय है, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में हार के बाद वाम छात्र राजनीति आगे अपने आपको कैसे संभालेगी इस पर भी सवाल है. फिलहाल केरलम हारन के बाद वामदलों का राजनीति में प्रभावी रूप से वापसी करना बेहद कठिन नजर आ रहा है. हालांकि जानकार वामदलों की इस स्थिति को उनके ना वक्त के साथ ना बदलने को जिम्मेदार मानते हैं. रूस और चीन में लेफ्ट है, इन देशों ने विकास के लिए वक्त के साथ कई नई चीजों को आत्मसात किया है, लेकिन भारत के वामपंथी अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं, जो ना तो यूथ को प्रभावित कर पा रही है और ना ही उनके पास कोई स्पष्ट उद्देश्य है.
ये भी पढे़ं: ‘EVM पर हार का ठीकरा ना फोड़ें’, पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम पर बाबा रामदेव बोले- जनतंत्र सबसे बड़ा है