BJP से फिर दोस्ती के दरवाजे खुले? उद्धव-फडणवीस की मुलाकात पर राउत के बयान से बढ़ी सरगर्मी

maharashtra politics: महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फ‍िर उद्धव-फडणवीस की मुलाकात के बाद अटकलों का बाजार गर्म है. ऐसा कहा जा रहा है कि दोनों लोग एक बार फ‍िर साथ आ सकते हैं.
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राज ठाकरे-देवेंद्र फडणवीस और उद्धव की मुलाकात

Maharashtra Politics: महाराष्ट्र की राजनीति हमेशा सुर्खियों में बनी रहती है. यहां नेताओं के बयान और उनकी मुलाकातों के कारण हर रोज नई तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं. अब यहां एक बार फ‍िर नए समीकरणों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे हाल ही में एक ही मंच पर नजर आए. इसके बाद से ही अटकलों का बाजार गरम है. खास बात यह है कि इस मुलाकात पर संजय राउत का बयान भी सामने आया है.

दरअसल, मुंबई में गुरुवार को ‘महाराष्ट्र की हास्य रेखा’ नाम की किताब का विमोचन कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम में फडणवीस, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे शामिल हुए. राजनीतिक विरोध के बावजूद तीनों नेताओं ने एक-दूसरे के साथ मंच साझा किया. अपने भाषणों में हल्के-फुल्के अंदाज में राजनीतिक तंज भी कसे.

भविष्य में क्या होगा, कौन जानता है

इस कार्यक्रम को लेकर संजय राउत से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस एक साथ थे. दोनों के बीच अच्छी बातचीत हुई और उन्होंने शानदार भाषण भी दिए. उनके बीच पुराना जुड़ाव रहा है और इस आत्मीयता को बनाए रखना चाहिए, क्योंकि दोनों करीब 25 साल तक साथ रहे हैं. भविष्य में क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता.

राउत के इस बयान को राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है. हालांकि, उन्होंने किसी नए गठबंधन या भाजपा के साथ दोबारा जाने की बात सीधे तौर पर नहीं कही.

फडणवीस और बीजेपी से दुश्मनी नहीं

संजय राउत ने साफ किया कि उनकी किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी उनका कोई निजी विवाद नहीं है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी अपने मुद्दों और विचारधारा के लिए संघर्ष जारी रखेगी.

राजनीति में हमेशा बदलाव की गुंजाइश

राउत ने महाराष्ट्र की राजनीति को अस्थिर बताते हुए कहा कि राजनीति में परिस्थितियां कभी भी बदल सकती हैं. बहुमत और जनता का रुख भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता. लोकतंत्र का मतलब ही बदलाव और परिवर्तन है. कोई भी पार्टी या नेता हमेशा सत्ता में नहीं रह सकता.

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