मौत भी न तोड़ सकी ममता का बंधन, ओंकारेश्वर में बंदर की संवेदनशील कहानी ने की सबकी आंखें नम, जानें क्या है मामला
बंदर की अनोखी कहानी ने की सभी की आंखे नम
रिपोर्ट – घनश्याम माहिल्या, ओंकारेश्वर
MP News: मध्य प्रदेश की तीर्थ नगरी ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग में प्रकृति द्वारा इंसानियत का एक ऐसा दृश्य देखने को मिला है, जिसे देखकर हर किसी की आंखें नम हो रही हैं. ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर आश्रम परिसर में पिछले 15-20 दिनों से एक बंदर अपने मृत बच्चे के शरीर को लेकर यहां-वहां घूमता नजर आ रहा है, लेकिन वह बच्चे के शरीर को छोड़ने को बिल्कुल भी तैयार नहीं है.
मां की ममता का अनोखा दृश्य
यह मां की ममता का ऐसा दृश्य है, जो शायद पहले कभी देखने को नहीं मिला होगा. स्थानीय निवासी लक्ष्मीबाई ने जानकारी देते हुए बताया कि पिछले 15-20 दिनों से वे इस बंदर को देख रही हैं, जो अपने मृत बच्चे के शरीर को लेकर इधर-उधर घूम रहा है, लेकिन उसे छोड़ने को तैयार नहीं है. उन्होंने बताया कि कई बार कोशिश की गई, लेकिन वह अपने बच्चे को किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं होता. इससे पहले भी ऐसे कई दृश्य यहां देखे गए हैं, लेकिन यह बंदर बार-बार अपने बच्चे को जगाने की कोशिश करता है, उसे दुलारता है. यह प्यार जताने का एक ऐसा तरीका है, जो इंसानों से बिल्कुल अलग नजर आता है.
ममता के अलग-अलग रूप
कभी वह पेड़ पर एक हाथ से बच्चे को पकड़कर चढ़ता है, तो कभी बच्चे को लटकाकर घरों की छतों पर कूदता नजर आता है. कई बार वह बच्चे के शरीर के साथ पेड़ की डालियों पर लटकता दिखाई देता है. कभी उसे सीने से चिपकाकर, तो कभी गोद में उठाकर प्यार-दुलार करता है, और कभी अपने मुंह से उसके बाल खींचता हुआ भी नजर आता है. बंदरों की एक सामान्य जीवनशैली होती है, जिसमें वे पेड़ों और घरों की छतों पर रहकर जीवन बिताते हैं. वे अपने छोटे-छोटे बच्चों को पेड़ों पर चढ़ना सिखाते हैं, उन्हें भोजन करना सिखाते हैं और परिवार के साथ रहना भी सिखाते हैं, तथा अंत समय तक उन्हें अपने साथ रखते हैं.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें भावनाएं
जब इस व्यवहार को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने की कोशिश की गई, तो वेटनरी डॉक्टर डॉ. शिवपाल कलमें ने बताया कि इंसानों की तरह ही जानवरों में भी ममता का भाव होता है. वे भी अपने बच्चों को प्यार और दुलार करते हैं. उनकी मनोवैज्ञानिक स्थिति बच्चों के साथ रहते-रहते इस प्रकार विकसित हो जाती है कि गहरे भावनात्मक लगाव के कारण वे उन्हें छोड़ना नहीं चाहते.
आज के सामाजिक रिश्तों पर सवाल
जानवरों में इंसानों की तरह शोक मनाने का व्यवहार भले ही अलग हो, लेकिन रिश्तों को निभाने की भावना कई बार इंसानों से भी ज्यादा मजबूत होती है. आज के समय में जहां कई लोग अपने बुजुर्गों को वृद्ध आश्रमों में छोड़ देते हैं, वहीं यह बंदर अपने मृत बच्चे को भी छोड़ने को तैयार नहीं है.
आज भी ऐसे कई वृद्ध आश्रम हैं, जहां अनेक बुजुर्ग मिलते हैं, जिन्हें उनके अपने ही घर से बाहर निकाल देते हैं या यहां छोड़कर चले जाते हैं. वे किसी न किसी पीड़ा के साथ विरह का दुख सहते हैं. कोई रोता है, कोई बिलखता है, तो कोई अपने छोटे-छोटे पोते-पोतियों को याद करता है. कोई अपनों की एक झलक पाने के लिए तरसता रहता है. लेकिन इन सबके बीच यह दृश्य यह सोचने पर मजबूर करता है कि जानवरों के पारिवारिक बंधन कई बार इंसानों से भी अधिक मजबूत होते हैं.
प्रेम जीवन-मृत्यु से परे है
यह केवल एक बंदर की कहानी नहीं है, बल्कि यह प्रकृति द्वारा दिखाया गया इंसानियत का आईना है. यह हमें बताता है कि प्रेम और लगाव जीवन और मृत्यु की सीमाओं से परे होते हैं.
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