‘सहमति से बने संबंध दुष्‍कर्म नहीं…’, MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, रद्द की कर्मचारी पर दर्ज रेप की FIR

MP News: दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं और संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने हैं, तो ऐसे मामले को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
Jabalpur High Court (File Photo)

जबलपुर हाई कोर्ट(File Photo)

MP News: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं और संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने हैं, तो ऐसे मामले को दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने इसी आधार पर एक केंद्रीय कर्मचारी के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म की एफआईआर और ट्रायल कोर्ट में लंबित आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने का आदेश दिया.

क्या था मामला?

मामला भोपाल के एक केंद्रीय कर्मचारी से जुड़ा था. याचिकाकर्ता के अनुसार उसकी विवाहित सहकर्मी ने छोला थाना में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि वर्ष 2020 में उसे नशीला पदार्थ पिलाकर दुष्कर्म किया गया. महिला का यह भी आरोप था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर करीब चार साल तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए.

सुनवाई में कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों के रिकॉर्ड और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण किया. अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता शिक्षित और विवाहित महिला है तथा उसका एक बच्चा भी है. ऐसे में वह इस तथ्य से भली-भांति परिचित थी कि पति से विधिवत तलाक लिए बिना आरोपी से विवाह संभव नहीं था.

एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई रद्द

कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने महिला को धमकाया, ब्लैकमेल किया या शादी का झूठा वादा कर उसकी सहमति हासिल की थी. अदालत की नजर में दोनों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध रहे, इसलिए इस मामले में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता. इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने एफआईआर और लंबित आपराधिक प्रकरण को निरस्त करने का आदेश दिया.

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