नई दिल्ली. जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ई-कॉमर्स कंपनियों की जवाबदेही को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है. आयोग ने साफ कहा है कि ऑनलाइन शॉपिंग प्लैटफॉर्म सिर्फ ‘डिजिटल बिचौलिया’ होने का हवाला देकर गलत सामान की सप्लाई और खराब रिटर्न प्रक्रिया की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते. साउथ-II जिला उपभोक्ता आयोग ने सर्विस में कमी का दोषी मानते हुए Myntra को उपभोक्ता को 10,000 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है.
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला सितंबर 2020 का है, जब उपभोक्ता निष्ठा मित्तल ने Myntra से कुछ सामान ऑनलाइन ऑर्डर किया था. निष्ठा को जो बाथरूम एक्सेसरी सेट मिला, वह ऑर्डर की गई डिटेल से बिल्कुल अलग था. इसके अलावा, एक ट्राउजर की फिटिंग में भी समस्या थी. जब उन्होंने सामान वापस करना चाहा, तो कंपनी ने यह कहकर डोरस्टेप पिकअप से इनकार कर दिया कि वह पिन कोड उनकी सेवा के दायरे में नहीं आता. कंपनी की ओर से सामान भेजने के लिए जो दूसरा पता दिया गया, वह गलत निकला. वहीं, दूसरे प्रोडक्ट का रिटर्न भी कथित तौर पर क्वालिटी चेक फेल होने का हवाला देकर रोक दिया गया और रिफंड नहीं दिया गया.
आयोग की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए आयोग की बेंच (अध्यक्ष मोनिका अग्रवाल श्रीवास्तव, सदस्य डॉ. राजेंद्र धर और रितु गारोडिया) ने ई-कॉमर्स कंपनियों की कार्यशैली पर कड़ी आपत्ति जताई. बेंच ने स्पष्ट किया कि ई-कॉमर्स प्लैटफॉर्म का काम केवल वेबसाइट उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है. जब प्लैटफॉर्म उपभोक्ता और विक्रेता के बीच लेन-देन को सुविधाजनक बनाता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता.
आयोग ने गलत सामान भेजने, पिकअप से इनकार करने, रिटर्न के लिए गलत पता देने और रिफंड रोकने जैसी सभी घटनाओं को ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) माना और Myntra को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया.
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