बंगाल में किस खतरे की आशंका, क्या लगेगी चुनावी हिंसा की घटनाओं पर लगाम? चुनाव आयोग की बड़ी तैयारी
बंगाल चुनाव (फोटो- विस्तार न्यूज)
West Bengal: बंगाल में चुनाव का मतलब सिर्फ वोटिंग नहीं, बल्कि कई बार तनाव, टकराव और हिंसा की आशंका भी बन जाता है. इन्हीं हालातों को देखते हुए चुनाव आयोग ने राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करते हुए भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती कर दी है ताकि राज्य में पूरी सुरक्षा और निष्पक्षता के साथ चुनाव को खत्म कराया जा सके.
पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा का इतिहास नया नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में लगातार तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की खबरें सामने आती रही हैं. अगर इस राजनीतिक टकराव की जड़ देखें, तो 2014 के बाद BJP ने बंगाल की राजनीति में तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू की. पहले जहां मुख्य मुकाबला TMC और वाम दलों के बीच होता था, वहीं 2019 के बाद BJP एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी. लेकिन बीजेपी के बढ़ते कद से टीएमसी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी और नतीजा ये हुआ कि दोनों दलों के बीच हिंसा की घटनाएं बेहद आम हो गईं.
नड्डा पर हुआ था हमला
3 दिसंबर 2020 को पार्टी कार्यक्रम के लिए बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में गए थे, जहां उनके काफिले पर पत्थरबाजी और हमला हुआ. यही नहीं 2025 में खगेन मुर्मू जब अपने क्षेत्र में बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करने गए थे, तो उनके ऊपर भी पथराव हुआ. ये सिर्फ दो ही घटनाएं नहीं हैं. बंगाल में हर साल किसी न किसी बीजेपी नेता या कार्यकर्ता पर हमले की खबर आती रही है.
अगर इसे राजनीतिक रूप से देखा जाए तो TMC का लक्ष्य बंगाल में अपनी सत्ता बनाए रखना, BJP जैसी राष्ट्रीय चुनौती को रोकना और स्थानीय मुद्दों-जैसे पहचान, भाषा और क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत करना रहा है. 2019 से लेकर अबतक राज्य के नंदीग्राम, कूच बिहार, उत्तर 24 परगना, बीरभूम और हावड़ा जैसी जगहों से हिंसा की खबरें आती रही हैं. हाल ही में बंगाल के हुगली से टीएमसी- बीजेपी के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प की खबर भी सामने आई, जहां दोनों पक्ष के कार्यकर्ता आपस में लड़ते नजर आए.
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बंगाल चुनाव में कई बार आईं हिंसा की खबरें
TMC की भूमिका को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. BJP ने TMC पर आरोप लगाए कि उन्होंने जीत के बाद विरोधियों पर हमला किया. ताकि पार्टी राज्य में अपनी पूरी पकड़ बनाए रखें. लेकिन TMC का कहना था कि इस हिंसा को राजनीतिक रूप से बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. इस पूरे मामले में कई घटनाएं जांच एजेंसियों और अदालतों तक पहुंचीं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी हिंसा को लेकर चिंता जताई थी. हालांकि हर घटना में जिम्मेदारी तय करना आसान नहीं रहा और कई मामले अब भी विवादित हैं.
कुछ ही दिनों में बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होने वाले हैं और राज्य में सियासी पारा हाई है. चुनावी रैलियों में आरोप-प्रत्यारोप, प्रशासन पर सवाल और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव जैसी घटनाएं चालू हैं. इसलिए चुनाव आयोग ने जोखिम से बचने के लिए बंगाल में शांतीपूर्ण चुनाव कराने की रणनीति पहले से ही बना दी है.
चुनाव आयोग का क्या है प्लान?
चुनाव आयोग ने पूरे राज्य में मार्च से ही भारी सुरक्षा बलों की तैनाती की है, जिसमें CRPF, BSF, ITBP और SSB जैसी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की कंपनियां शामिल हैं. हजारों जवानों को चरणबद्ध तरीके से तैनात किया जा रहा है ताकि चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो सके. कुछ बलों की तैनाती मतदान के बाद भी जारी रहने की योजना है ताकि पोस्ट-पोल हिंसा को रोका जा सके.
बंगाल में चाहे जीत BJP की हो या TMC की. लेकिन नतीजों के बाद जो हिंसा भड़कती है, वो कार्यकर्ताओं की जान और जनता की सुरक्षा-दोनों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है. इसलिए अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चुनाव आयोग के इस कड़े इंतजाम के बाद पश्चिम बंगाल में चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से होंगे, या फिर एक बार फिर हिंसा और तनाव का साया लोकतंत्र पर भारी पड़ेगा.