‘आस्था पर कोर्ट फैसला नहीं कर सकता, सबके अपने नियम…’,सबरीमाला एंट्री विवाद पर केंद्र का SC को जवाब

Sabarimala Temple Case: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से सबरीमाला मंदिर में एंट्री विवाद मामले पर हलफनामा दाखिल किया गया है. सरकार ने कहा कि यह मुद्दा केवल लैंगिक समानता का नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है.
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सुप्रीम कोर्ट (File Photo)

Sabrimala Temple Case: केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के एंट्री दिए जाने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. इस दौरान केंद्र सरकार ने इस मामले अपना हलफनामा दाखिल कर द‍िया है.सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार ने कहा कि कोई सेकुलर कोर्ट किसी धार्मिक प्रथा या मान्‍यता को सिर्फ अंधविश्वास नहीं कह सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पास ऐसा तय करने की विशेषज्ञता नहीं होती है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने पीरियड्स के दौरान महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का विरोध किया. इस दौरान सरकार की तरफ से कहा गया कि भगवान अय्यप्पा ब्रह्मचारी हैं और महिलाओं से विमुख रहते हैं. यही वजह है कि अदालतें आस्था या विश्वास पर फैसला नहीं कर सकती हैं.

सरकार की तरफ से तर्क दिया गया कि यह मुद्दा केवल लैंगिक समानता का नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से भी जुड़ा हुआ है. ऐसे में अदालत के लिए ऐसा फैसला देना खतरनाक हो सकता है.

कोर्ट में क्या बोले सॉलिसिटर जनरल?

 सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि देश में कई धर्मों के साथ-साथ पंथ और समुदाय हैं. सबके सालों पुराने नियम हैं जो आज भी चल रहे हैं. सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हर धार्मिक जगह के अपने नियम होते हैं. जैसे कि दरगाह या गुरुद्वारे में सिर ढक कर जाना. इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि आधुनिक अवधारणाओं के चलते धार्मिक परंपराओं को ना बदला जाए. उन्‍होंने ये भी कहा कि पहले समाज के कुछ वर्गों के साथ जो भेदभाव होता था, उसे दूर करना एक संवैधानिक कर्तव्य था. दोनों बातों को समान समझना गलत है. केंद्र सरकार की ओर से SG मेहता ने कहा कि सरकार किसी भी पक्ष में नहीं है.

क्‍या है पूरा मामला?

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं. सुप्रीम कोर्ट में जिस सबरीमाला मंदिर को लेकर सुनवाई हो रही है. उसका पूरा मामला सालों पुराना है. यह मंदिर भगवान अयप्पा का है, जो कि ब्रह्मचारी थे. यही वजह है कि अब तक इस मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के अंदर जाने पर रोक थी.

हालांकि महिलाओं के विरोध के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जिसमें कोर्ट ने 2018 में ही मंद‍िर में लगी हुई रोक को हटाने का फैसला किया था. कोर्ट के फैसले के बाद पूरे केरल में जमकर विरोध हुआ था. यही वजह है कि इस मामले पर कई  कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं. उन्‍हीं याचिका पर अब सुनवाई हो रही है.

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