ग्वालियर में है मौत के देवता यमराज का 330 साल पुराना मंदिर, नर्क से बचने के लिए लोग करते हैं पूजा

Gwalior Markandeshwar Mandir: कहा जाता है कि यहां यमराज को क्रोधित देवता के रूप में नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक और न्याय के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है. नरक चतुर्दशी यानी नरक चौदस के दिन यहां का नजारा पूरी तरह बदल जाता है
GWALIOR

मारकंडेश्वर महादेव मंदिर

Gwalior Markandeshwar Mandir: ग्वालियर के फूलबाग चौराहे के पास एक ऐसा मंदिर है, जहां कदम रखते ही लोग मौत को याद नहीं करते, बल्कि मौत के बाद की पीड़ा से मुक्ति की कामना करते हैं.यह है मारकंडेश्वर महादेव मंदिर, जहां भगवान शिव के साथ-साथ उनके ही समकालीन कहे जाने वाले यमराज की भी पूजा होती है. देश में यमराज के गिने-चुने मंदिरों में से एक यह मंदिर करीब तीन शताब्दियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मन्नत अलग है

आमतौर पर लोग मंदिरों में सुख, समृद्धि, नौकरी और स्वास्थ्य के लिए जाते हैं. लेकिन यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मन्नत थोड़ी अलग है. कोई अपने बुजुर्ग माता-पिता के लिए अंतिम समय में शांति मांगता है, तो कोई खुद के लिए आसान विदाई की प्रार्थना करता है.पुजारी बताते हैं कि यहां कोई भय नहीं फैलाया जाता, बल्कि यह समझाया जाता है कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं, एक पड़ाव है.

सिंधिया काल की विरासत और अनूठी परंपरा

स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण मराठा शासन के दौरान हुआ था. सिंधिया राजघराने से जुड़े लोगों ने इस स्थान को विशेष महत्व दिया.मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के पास ही यमराज की प्रतिमा स्थापित है, जो अपने आप में दुर्लभ है.कहा जाता है कि यहां यमराज को क्रोधित देवता के रूप में नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक और न्याय के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है. नरक चतुर्दशी यानी नरक चौदस के दिन यहां का नजारा पूरी तरह बदल जाता है

दूर दराज से पहुंचते हैं लोग

सुबह से ही श्रद्धालुओं की कतार लग जाती है. दूर-दराज के गांवों और शहरों से लोग यहां पहुंचते हैं. महिलाएं अपने परिवार के लिए दीपक लेकर आती हैं और मंदिर के बाहर यम के नाम का दीप जलाती हैं. मान्यता है कि इस दिन दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है.

यहां की पूजा विधि भी अन्य मंदिरों से अलग है. सबसे पहले शिवलिंग का जलाभिषेक होता है, इसके बाद यमराज की प्रतिमा को साफ कर पंचामृत से स्नान कराया जाता है. घी और तिल के तेल से अभिषेक के बाद इत्र अर्पित किया जाता है. इसके बाद चार मुख वाले चांदी के दीपक से विशेष आरती होती है. आरती के समय पूरा मंदिर घंटियों और शंखनाद से गूंज उठता है.