जनता पर महंगाई की मार, तेल कंपनियों पर मुनाफे की बौछार: But How ?
इंडियन ऑइल पेट्रोल पंप
पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों में इज़ाफ़े से चौतरफ़ा महंगाई का डोज़ बढ़ता जा रहा है. जानकार अभी और ज़्यादा खुदरा बाजार, यानी आपकी गाड़ी की टंकी तक पहुँचने वाले तेल की क़ीमतों में 10 रुपये तक के इज़ाफ़े की भविष्यवाणी कर रहे हैं. अब लाज़मी है कि मार्केट की धड़कनें बढ़ी हुई हैं और देश का आम आदमी अपनी जेब देख सकपकाया हुआ है. लेकिन, दूसरी तरफ़ वित्त वर्ष 2025-26 में तेल कंपनियों के मुनाफ़े से इनके सीईओज के दिल गार्डेन-गार्डेन हुए पड़े हैं. अब सवाल उठता है, कैसे??? मुनाफ़ा अगर जबराट है, तो फिर कंपनियाँ फिर तेल की क़ीमतें क्यों बढ़ा रही हैं?
दरअसल, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ( IOC) ने हाल ही में वित्त वर्ष 2025-26 में अपना शुद्ध मुनाफा लगभग 2.8 गुना बढ़ने की जानकारी दी. इतना ही नहीं, कंपनी ने निवेशकों के लिए डिविडेंड भी घोषित किया. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब आम उपभोक्ता महंगे ईंधन का बोझ उठा रहा है, तब तेल कंपनियों के मुनाफे इतने तेजी से कैसे बढ़ रहे हैं? दरअसल, इस विरोधाभास के पीछे वैश्विक तेल बाजार, टैक्स स्ट्रक्चर, सरकारी नीतियां और तेल कंपनियों के बिजनेस मॉडल की जटिल परतें छिपी हैं.
पेट्रोल-डीजल क्यों महंगा हो रहा है?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ते ही उसका सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है. पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक सप्लाई बाधाओं ने कच्चे तेल की कीमतों को अस्थिर बनाए रखा. इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी भी आयात लागत बढ़ाती है. लेकिन केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतें ही पेट्रोल-डीजल महंगा होने की वजह नहीं हैं. भारत में ईंधन की खुदरा कीमत का बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में लिया जाता है. केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारें वैट वसूलती हैं. कई राज्यों में पेट्रोल के दाम का 45 से 55 प्रतिशत हिस्सा टैक्स का होता है. यानी अगर कच्चे तेल की कीमत थोड़ी घट भी जाए, तब भी उपभोक्ताओं को बड़ी राहत तुरंत नहीं मिलती.
फिर तेल कंपनियां मुनाफा कैसे कमा रही हैं?
यही वह बिंदु है जहां आम जनता को सबसे ज्यादा विरोधाभास दिखाई देता है. दरअसल तेल कंपनियां केवल पेट्रोल-डीजल बेचकर ही पैसा नहीं कमातीं, बल्कि उनका बड़ा कारोबार रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स, गैस, एविएशन फ्यूल और अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग से भी जुड़ा होता है. जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल और रिफाइंड उत्पादों के बीच कीमत का अंतर बढ़ता है, तो कंपनियों का ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) बढ़ जाता है. इसका मतलब है कि कंपनियां कच्चा तेल सस्ते में खरीदकर उससे बने उत्पाद अधिक कीमत पर बेच पाती हैं.
इसी दौरान कई कंपनियों को इन्वेंटरी गेन भी होता है. उदाहरण के तौर पर यदि कंपनी ने पहले कम कीमत पर तेल खरीदकर स्टोर किया हो और बाद में बाजार कीमत बढ़ जाए, तो पुराने स्टॉक से अतिरिक्त लाभ मिलता है. IOC, BPCL और HPCL जैसी कंपनियों के हालिया मुनाफे में यही प्रमुख वजहें रही हैं.
उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिलती?
आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि जब कंपनियां मुनाफे में हैं, तो पेट्रोल-डीजल सस्ता क्यों नहीं किया जाता? इसका उत्तर पूरी तरह सीधा नहीं है. भारत में तेल कंपनियां पूरी तरह स्वतंत्र बाजार व्यवस्था में काम नहीं करतीं. कई बार सरकार उन्हें राजनीतिक और सामाजिक कारणों से कीमतें नियंत्रित रखने के लिए कहती है. उदाहरण के लिए चुनावी अवधि या महंगाई बढ़ने के समय कंपनियां लंबे समय तक कीमतें नहीं बढ़ातीं, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हो चुका होता है. इससे कंपनियों को नुकसान होता है. बाद में जब परिस्थितियां सामान्य होती हैं, तो वही कंपनियां रिफाइनिंग लाभ और मूल्य समायोजन के जरिए अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत करती हैं. यानी तेल कंपनियों का मुनाफा हमेशा लगातार नहीं रहता, बल्कि कई बार वे बड़े घाटे के बाद रिकवरी करती हैं.
सरकार की दोहरी चुनौती
सरकार के सामने भी बड़ा संतुलन बनाने की चुनौती रहती है. अगर टैक्स घटाए जाएं तो जनता को राहत मिल सकती है, लेकिन इससे सरकार की आय कम होगी. पेट्रोलियम टैक्स केंद्र और राज्यों की आय का बड़ा स्रोत है. इसी पैसे से सड़क, इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याणकारी योजनाएं चलती हैं. दूसरी ओर यदि तेल कंपनियों पर अधिक दबाव डाला जाए और उन्हें लगातार कम कीमत पर ईंधन बेचने को कहा जाए, तो उनकी निवेश क्षमता और ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है. यही कारण है कि सरकार पूरी तरह बाजार आधारित मूल्य निर्धारण और राजनीतिक हस्तक्षेप — दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है.
जनता की नजर में क्यों गहराता है असंतोष?
हालांकि आर्थिक तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन आम उपभोक्ता के लिए वास्तविकता अलग है. दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में लोग पहले से ही महंगे किराए, खाद्य पदार्थों की कीमतों और बिजली बिलों से जूझ रहे हैं. मुद्रा स्फिति के हिसाब से आज 25 साल पहले जिसकी सैलरी 20 हज़ार रुपये थी, वो आज की तारीख़ में एक लाख से ऊपर का हैसियत रखती है. ऐसे में पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहता. परिवहन लागत बढ़ने से सब्जियां, दूध, ऑनलाइन डिलीवरी और रोजमर्रा की वस्तुएं भी महंगी हो जाती हैं. यानी तेल की कीमतें पूरे महंगाई चक्र को प्रभावित करती हैं. इसी वजह से जब कंपनियों के रिकॉर्ड मुनाफे की खबरें आती हैं, तो जनता में यह भावना मजबूत होती है कि आर्थिक बोझ का बड़ा हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है.